Thursday, April 14, 2011

Agar hum na hote

गर हम न होते तो क्या होता
ये जमीं न होती आसमां न होता
ये दिन न ढलता सवेरा न होता
इस कश्ती का किनारा न होता

फरीश्तों के दामन से निकलती क्या आह
परियो के घर  में होती क्या हाहाकार
चांद क्या निकलता तारे जग्म्गाते 
फुल पत्ते झरने क्या रोज मुस्कुराते

जीवन कि  कडी  क्या हमे याद करती
गर हम न होते तो क्या बात होती

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